श्रीमद् भागवत पुराण के सप्तम स्कन्ध की कथानुसार भगवान श्री विष्णुजी के द्वारपाल जय और विजय को ब्रह्माजी के मानस पुत्र सनकादि ऋषियों के श्राप के कारण तीन जन्मों तक असुर योनियों में जाना पड़ा । वे दोनो द्वारपाल ही दिति के पुत्र बनकर पृथ्वी पर आयें। उनमें बड़े पुत्र का नाम हिरण्यकशिपु तथा छोटें का नाम हिरण्यक्ष था और दानव समाज के यही दोनों सर्वश्रेष्ठ थे ।
श्री विष्णु भगवान ने नृसिंह का रूप धारण कर हिरण्यकशिपु को तथा पृथ्वी का उद्धार करने के समय वाराह अवतार ग्रहण करके हिपण्याक्ष कों मारा। दैत्यवंश के शिरोमणि इन दैत्यों के उद्धार के लिए श्री विष्णु भगवान ने जहां अवतरण लिया वह एरच नगर क्षेत्र है । इसी दैत्य वंश में परम भागवत, परम विष्णु भक्त श्री प्रहलाद जी का जन्म हुआ। जिनके पिता का नाम हिरण्यकशिपु एवं माता का नाम कयाधु हुआ। भगवान विष्णु ने वराह रूप रखकर हिरण्याक्ष का वध किया । अपने छोटे भाई हिरण्याक्ष के वध करने के कारण हिरण्यकशिपु भगवान विष्णु से विरोध रखने लगा था किन्तु हिरण्यकशिपु के पुत्र श्री भक्त प्रहलाद जी भगवान विष्णु की अनन्य भक्ति में लीन रहते थे। जिसके कारण राक्षस राज हिरण्यकशिपु ने अपने पुत्र को कई बार समझाने का प्रयास किया लेकिन श्री प्रहलाद जी की निर्मल भक्ति व बुद्धि को दूषित नहीं कर पाये तो क्रोध दिखाकर, डराने धमकाने के प्रयास के साथ अनगिनत यातनायें देने लगे यथा हाथी के पैर से कुचलवाना, विषाक्त भोजन देना, सर्प दंशित कराना, एरच के निकटस्थ डीकांचल पर्वत से अथाह जल राशि में ढकेलकर डुबोना तथा होलिका के साथ बैठाकर अग्नि में जलाने का प्रयास करना किन्तु भगवान विष्णु के परम भक्त प्रहलाद का बाल बांका न हुआ। बल्कि होलिका ही चिता में जलकर भस्म हो गयी । अन्त में हिरण्यकशिपु ने जंजीरों से तप्त लौह स्तम्भ से बांधकर प्रहलाद से पूछा- तेरा नारायण कहाँ है । प्रहलाद के यह उत्तर देने पर कि नारायण सर्वत्र है । हिरण्यकशिपु ने प्रश्न किया— क्या इस लौह स्तम्भ में भी । प्रहलाद ने उत्तर दिया- अवश्य । इस पर हिरण्यकशिपु ने क्रोधकर तलवार से प्रहलाद पर बार किया तलवार के स्तम्भ से टकराते ही भंयकर गर्जना करते हुए नृसिंह भगवान अवतरित हुए, हिरण्यकशिपु को अपनी जंघाओं पर पटक कर नाखूनों से उसका उदर विदीर्ण कर अंतड़ियां निकाल ली। सायंकाल का समय था – दिवस और रात्रि का संधि दिवस । ब्रह्मा जी के वरदान से सुरक्षित हिरण्यकशिपु का वध इस प्रकार नृसिंह भगवान ने किया प्रहलाद को अभयदान दिया ।
हिरण्यकशिपु के अत्याचारों से त्रस्त जन समूह ने हर्षध्वनि से जय जयकार करते हुए होलिका की चिता की भस्म, गुलाल, रंगों से एक दूसरें को अभिसिक्त कर अपनी प्रसन्नता प्रकट की । यही प्रथम होलिकोत्सव था जो नगर एरच से प्रारम्भ होकर आज विश्वभर में प्रचलित है।